12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे अद्भुत Ujjain Mahakal का संपूर्ण रहस्यमयी इतिहास (2026)
भारत की पावन और पवित्र भूमि अनेक चमत्कारों, पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र रही है। जब भी हम सनातन धर्म में शिव भक्ति की बात करते हैं, तो सबसे पहला नाम जो हमारे मन और मस्तिष्क में गूंजता है, वह है कालों के काल महाकाल का। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक और सबसे विशेष Ujjain Mahakal का मंदिर मध्य प्रदेश की मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है।
यह केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था, विश्वास और जीवन ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है। साल 2026 में भी, Ujjain Mahakal की महिमा और इसके चमत्कारों को देखने के लिए देश-विदेश से हर दिन लाखों श्रद्धालु उज्जैन की धरती पर आते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस स्वरूप में आज हम महाकालेश्वर मंदिर को देखते हैं, उसका इतिहास कितना पुराना है? कैसे आक्रांताओं के हमलों के बाद भी Ujjain Mahakal ने अपने अस्तित्व को बचाए रखा?
आइए, इस विस्तृत लेख में हम Ujjain Mahakal के पौराणिक, ऐतिहासिक और रहस्यमयी सफर पर चलते हैं। इस पोस्ट में हम महाकाल के उद्भव, राजा विक्रमादित्य के काल, इल्तुतमिश के आक्रमण, 500 सालों तक कुएं में छिपे रहने के रहस्य और विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती के विज्ञान को गहराई से समझेंगे।
उज्जैन (अवंतिका नगरी) की आध्यात्मिक महिमा
प्राचीन काल में उज्जैन को ‘अवंतिका’, ‘उज्जयिनी’, ‘विशाला’ और ‘कनकशृंगा’ जैसे कई सुंदर नामों से जाना जाता था। हिन्दू धर्म के अनुसार, पृथ्वी पर सात मोक्षदायिनी (मोक्ष प्रदान करने वाली) नगरियां हैं – अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जैन) और द्वारका। इनमें अवंतिका का स्थान बेहद खास है क्योंकि यहाँ कालों के स्वामी भगवान Ujjain Mahakal स्वयं निवास करते हैं।
वराह पुराण के अनुसार, उज्जैन पृथ्वी का ‘नाभिस्थल’ (Center point of the Earth) है। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही पूरे विश्व की समय गणना (Time calculation) और खगोल विज्ञान (Astronomy) का मुख्य केंद्र उज्जैन ही रहा है। यहाँ की क्षिप्रा नदी के तट पर हर 12 साल में ‘सिंहस्थ कुंभ मेला’ लगता है, जो इस नगरी की दिव्यता को और बढ़ा देता है।

पौराणिक कथाएँ: Ujjain Mahakal का पृथ्वी पर प्राकट्य
Ujjain Mahakal के ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होने के पीछे कई अद्भुत पौराणिक कथाएं शिव पुराण और स्कंद पुराण में वर्णित हैं। इनमें से दो कथाएं सबसे अधिक प्रचलित हैं, जो दर्शाती हैं कि भगवान शिव अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।
1. वेदप्रिय ब्राह्मण और दूषण राक्षस की कथा
शिव पुराण के अनुसार, प्राचीन अवंतिका नगरी में वेदप्रिय नाम का एक परम ज्ञानी और शिवभक्त ब्राह्मण रहता था। वह और उनके चार पुत्र प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना करते थे। उनका जीवन अत्यंत शांतिपूर्ण और भक्तिमय था।
उसी समय, पास के रत्नमाल पर्वत पर ‘दूषण’ नाम का एक भयानक राक्षस रहता था। दूषण को ब्रह्मा जी से अजेय होने का वरदान प्राप्त था। अपनी शक्ति के अहंकार में चूर होकर, उसने अवंतिका नगरी पर हमला कर दिया। उसने ब्राह्मणों को पूजा-पाठ करने से रोक दिया और चारों ओर हाहाकार मचा दिया। दूषण के अत्याचारों से त्रस्त होकर वेदप्रिय ब्राह्मण और उनके पुत्रों ने अपने प्राणों की चिंता किए बिना भगवान शिव की घोर तपस्या शुरू कर दी।
जब दूषण उन्हें मारने के लिए आगे बढ़ा, तब अचानक एक भयंकर गर्जना हुई। जिस स्थान पर ब्राह्मण पार्थिव शिवलिंग की पूजा कर रहे थे, वहां की धरती फट गई और एक विशाल हुंकार के साथ भगवान शिव महाकाल के अत्यंत रौद्र रूप में प्रकट हुए। भगवान शिव ने एक ही झटके में दूषण राक्षस को भस्म कर दिया।
इसके बाद, सभी देवी-देवताओं और ब्राह्मणों ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे अवंतिका नगरी की रक्षा के लिए हमेशा के लिए यहीं विराजमान हो जाएं। भक्तों की यह सच्ची पुकार सुनकर भगवान शिव Ujjain Mahakal ज्योतिर्लिंग के रूप में उसी स्थान पर स्थापित हो गए।
2. राजा चंद्रसेन और बालक श्रीकर की कहानी
एक अन्य कथा के अनुसार, उज्जैन में भगवान शिव के एक परम भक्त राजा चंद्रसेन राज करते थे। एक बार राजा चंद्रसेन जब मंदिर में शिव की पूजा में लीन थे, तब श्रीकर नाम का एक 5 वर्षीय ग्वाला (चरवाहा) वहां आया। वह भी राजा के साथ पूजा करना चाहता था, लेकिन प्रहरियों ने उसे नगर के बाहर निकाल दिया।
उदास श्रीकर नगर के बाहर एक पत्थर को शिवलिंग मानकर उसकी पूजा करने लगा। उसी समय, रिपुदमन और सिंहादित्य नाम के दो दुश्मन राजाओं ने एक राक्षस की मदद से उज्जैन पर आक्रमण करने की योजना बनाई। बालक श्रीकर ने यह बात सुन ली और वह भगवान शिव से उज्जैन की रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगा। उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव महाकाल के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने दुश्मनों का नाश कर दिया। उस बालक की भक्ति के कारण ही Ujjain Mahakal ने हमेशा के लिए उज्जैन को अपना निवास स्थान बना लिया।
Ujjain Mahakal का ऐतिहासिक सफर और कालखंड
पौराणिक कथाओं से इतर, यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो Ujjain Mahakal का वर्णन हजारों साल पुराने ग्रंथों और सिक्कों में भी मिलता है। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र रहा है, बल्कि भारत के समृद्ध इतिहास का एक मूक गवाह भी है।
प्राचीन काल और महाकवि कालिदास का वर्णन
इतिहासकारों के अनुसार, छठी शताब्दी ईसा पूर्व (6th Century BC) में उज्जैन पर राजा चंड प्रद्योत का शासन था। उन्होंने अपने पुत्र कुमारसेन को महाकाल मंदिर की व्यवस्था सौंप रखी थी। इसके अलावा, चौथी से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के उज्जैन के सिक्कों पर भगवान शिव की आकृतियां छपी हुई मिली हैं।
प्राचीन भारत के महान कवि कालिदास ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘मेघदूतम्’ (Meghadutam) में Ujjain Mahakal मंदिर का बहुत ही मनोरम और सजीव वर्णन किया है। उन्होंने मंदिर के भव्य शिखर, संध्याकालीन आरती और मंदिर के प्रांगण के सौंदर्य को अपनी कविताओं में उकेरा है। गुप्त काल से पहले तक इस मंदिर के शिखर नहीं होते थे, इसकी छतें सपाट होती थीं, लेकिन गुप्त काल में राजा विक्रमादित्य के समय में इस मंदिर का भव्य नवनिर्माण किया गया।
राजा विक्रमादित्य और महाकाल की भक्ति
उज्जैन के इतिहास की चर्चा महान चक्रवर्ती सम्राट राजा विक्रमादित्य के बिना अधूरी है। राजा विक्रमादित्य Ujjain Mahakal के अनन्य भक्त थे। यह कहा जाता है कि उनके शासनकाल में उज्जैन ने अपने स्वर्ण युग (Golden Era) को देखा। राजा विक्रमादित्य ने ही ‘विक्रम संवत’ (हिन्दू पंचांग/कैलेंडर) की शुरुआत की थी, जिसका उपयोग आज भी पूरे भारत में किया जाता है। विक्रमादित्य के राज में महाकालेश्वर मंदिर में कला, संस्कृति और आध्यात्म अपने चरम पर था।

मुग़ल आक्रमण: 500 वर्षों तक कुएं में छिपा रहा ज्योतिर्लिंग Ujjain Mahakal
इतिहास हमेशा शांतिपूर्ण नहीं रहता। भारत के कई अन्य प्राचीन मंदिरों की तरह, Ujjain Mahakal मंदिर को भी विदेशी आक्रांताओं के गहरे घाव सहने पड़े। 11वीं और 12वीं शताब्दी तक यह मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ खड़ा था, लेकिन 13वीं सदी में एक भयानक अंधकार का युग आया।
सन 1235 ईसवी में, दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश (Iltutmish) ने उज्जैन पर भयानक आक्रमण किया। इल्तुतमिश की क्रूर सेना ने शहर में भारी तबाही मचाई और सदियों पुराने Ujjain Mahakal मंदिर को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। उन्होंने मूर्तियों को तोड़ा और मंदिर की संपदा को लूट लिया।
लेकिन सनातन धर्म के रक्षक पुजारियों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। जब उन्हें इल्तुतमिश के हमले की खबर मिली, तो उन्होंने गर्भगृह से मुख्य स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को निकाला और मंदिर परिसर में ही स्थित ‘कोटितीर्थ कुंड’ (एक जल से भरा कुआं) में सुरक्षित छिपा दिया।
आपको यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि आक्रांताओं से बचाने के लिए Ujjain Mahakal का यह पवित्र ज्योतिर्लिंग लगभग 500 वर्षों से भी अधिक समय तक उसी कुएं के जल में छिपा रहा। उस लंबे कालखंड में, मुस्लिम शासकों (विशेषकर औरंगजेब के समय) ने मंदिर के खंडहरों के ऊपर अपने निर्माण कर लिए थे। लेकिन शिवभक्तों के हृदय से महाकाल की आस्था कभी खत्म नहीं हुई; वे उस कुएं के पास ही गुप्त रूप से पूजा अर्चना करते रहे।
मराठा काल: Ujjain Mahakal का गौरवपूर्ण पुनर्निर्माण
समय का पहिया घूमा और 18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य ने पूरे भारत में अपना परचम लहराया। मराठा केवल वीर योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वे सनातन धर्म और मंदिरों के महान रक्षक और पुनर्निर्माणकर्ता भी थे।
सन 1734 ईसवी में, पेशवा बाजीराव प्रथम के कुशल सेनापति ‘राणोजी शिंदे’ (Ranoji Shinde) ने मालवा पर विजय प्राप्त की। जब उन्हें यह पता चला कि Ujjain Mahakal का वास्तविक ज्योतिर्लिंग 500 सालों से एक कुएं में विसर्जित है, तो उनकी आँखों में आंसू आ गए।
राणोजी शिंदे ने तुरंत उस कुएं से ज्योतिर्लिंग को ससम्मान बाहर निकलवाया और पूरे विधि-विधान से उसका जलाभिषेक कर उसे पुनः उसके मूल स्थान पर स्थापित करवाया। उन्होंने मुस्लिम ढांचों को हटाकर उस स्थान पर वर्तमान महाकालेश्वर मंदिर का भव्य निर्माण करवाया। इसके बाद राजा उदयादित्य और राजा नरवर्मन ने भी इस मंदिर के विस्तार में अहम भूमिका निभाई।
इस प्रकार, 5 सदियों के लंबे वनवास के बाद Ujjain Mahakal एक बार फिर से अपने पूर्ण गौरव और भव्यता के साथ दुनिया के सामने स्थापित हुए।
मंदिर की अद्भुत वास्तुकला (Architecture of Mahakal Temple)
वर्तमान Ujjain Mahakal मंदिर की वास्तुकला मराठा, भूमिजा और चालुक्य (Chalukya) शैलियों का एक उत्कृष्ट और बेजोड़ मिश्रण है। इस मंदिर की संरचना इतनी जटिल और वैज्ञानिक है कि यह आज भी आधुनिक आर्किटेक्ट्स को हैरान कर देती है।
मंदिर परिसर को मुख्य रूप से 5 मंजिलों (Levels) में बांटा गया है, जिसमें से एक मंजिल पूरी तरह से जमीन के नीचे (Underground) है।
- जमीन के नीचे (Garbhagriha): इसी भूमिगत और शांत गर्भगृह में कालों के काल Ujjain Mahakal दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं। यहाँ माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय की सुंदर प्रतिमाएं भी हैं।
- मध्य तल (Omkareshwar): महाकाल ज्योतिर्लिंग के ठीक ऊपर वाले तल पर ‘ओंकारेश्वर महादेव’ का शिवलिंग स्थापित है।
- तीसरा तल (Nagchandreshwar): मंदिर की तीसरी मंजिल पर भगवान ‘नागचंद्रेश्वर’ की अद्भुत प्रतिमा है। इस प्रतिमा में भगवान शिव और माता पार्वती दस मुखी सर्प शय्या पर विराजमान हैं। Ujjain Mahakal का यह नागचंद्रेश्वर मंदिर इतना रहस्यमयी है कि इसके कपाट साल में केवल एक बार, ‘नाग पंचमी’ (Nag Panchami) के दिन ही 24 घंटे के लिए भक्तों के दर्शन हेतु खोले जाते हैं।
मंदिर का विशाल शिखर आसमान को छूता हुआ प्रतीत होता है, और इसके प्रांगण में स्थित कोटितीर्थ कुंड का जल आज भी पवित्र माना जाता है।
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विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती: मृत्यु से जीवन का उत्सव Ujjain Mahakal
अगर आप उज्जैन आते हैं और आपने Ujjain Mahakal की ‘भस्म आरती’ (Bhasma Aarti) नहीं देखी, तो आपकी यात्रा अधूरी मानी जाती है। महाकालेश्वर पूरे विश्व में एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जहाँ प्रतिदिन तड़के भोर में (ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 4 बजे) भस्म आरती की जाती है। यह आरती जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य का सबसे बड़ा प्रतीक है।
भस्म आरती का विज्ञान और रहस्य
शब्द ‘भस्म’ का अर्थ है राख (Ash)। सनातन धर्म में भस्म को सृष्टि का सार माना गया है। जो कुछ भी उत्पन्न हुआ है, वह अंततः भस्म ही होगा। शिव पुराण के अनुसार, जब भगवान शिव ने दूषण राक्षस को मारा था, तो उसकी राख से ही अपना पहला श्रृंगार किया था। तब से लेकर आज तक Ujjain Mahakal को भस्म रमाने की यह अनोखी परंपरा चली आ रही है।
प्राचीन काल में इस आरती के लिए श्मशान घाट से लाई गई ताजी चिता की राख (मुर्दे की भस्म) का उपयोग किया जाता था। ऐसा माना जाता था कि शिव श्मशान वासी हैं और मृत्यु ही परम सत्य है। हालांकि, बदलते समय के साथ यह परंपरा बदली। वर्तमान में, Ujjain Mahakal की भस्म आरती के लिए गाय के गोबर के कंडे (उपले), शमी, पीपल, पलाश, बड़ और अमलतास की लकड़ियों को जलाकर मंत्रोच्चार के बीच शुद्ध भस्म तैयार की जाती है।
कैसे होती है आरती?
सुबह 4 बजे मंदिर के पट खुलते हैं। सबसे पहले भगवान का दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से महा पंचामृत अभिषेक होता है। फिर उन्हें भांग, चंदन, और सूखे मेवों से ‘राजा स्वरूप’ में सजाया जाता है। इसके बाद ज्योतिर्लिंग को एक महीन कपड़े से ढककर महानिर्वाणी अखाड़े के साधुओं द्वारा भस्म उड़ाई जाती है। इस आरती में शामिल होने वाला हर भक्त शिवमय हो जाता है। यह मान्यता है कि भस्म आरती के समय Ujjain Mahakal अपने निराकार रूप से साकार रूप में आते हैं।
(ध्यान दें: भस्म आरती में शामिल होने के लिए मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट से पहले से ऑनलाइन या ऑफलाइन एडवांस बुकिंग करानी पड़ती है।)
दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग का विशेष महत्व Ujjain Mahakal
भारत में मौजूद 12 ज्योतिर्लिंगों में से Ujjain Mahakal एकमात्र ऐसे ज्योतिर्लिंग हैं, जो ‘दक्षिणमुखी’ (South-facing) हैं। बाकी सभी ज्योतिर्लिंगों का मुख पूर्व दिशा की ओर है।
तंत्र शास्त्र और वास्तु विज्ञान के अनुसार, दक्षिण दिशा को यमराज (मृत्यु के देवता) और काल की दिशा माना जाता है। चूंकि भगवान शिव महाकाल हैं – अर्थात जो ‘काल’ (Time) और ‘मृत्यु’ (Death) दोनों को अपने नियंत्रण में रखते हैं – इसलिए उनका मुख दक्षिण की ओर है। अकाल मृत्यु (Untimely death) के भय से बचने, आयु वृद्धि और तंत्र साधना के लिए Ujjain Mahakal के इस दक्षिणमुखी स्वरूप की पूजा दुनिया में सबसे शक्तिशाली मानी गई है।
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‘महाकाल लोक’ कॉरिडोर: 21वीं सदी का अद्भुत विकास
साल 2022 में Ujjain Mahakal के इतिहास में एक नया और सुनहरा अध्याय जुड़ा, जब प्रधानमंत्री द्वारा ‘श्री महाकाल लोक’ (Shri Mahakal Lok Corridor) का भव्य लोकार्पण किया गया।
लगभग 900 मीटर लंबा यह कॉरिडोर भारत के सबसे बड़े धार्मिक प्रांगणों में से एक बन गया है।
- 108 आनंद तांडव स्तंभ: इस पूरे महाकाल पथ पर 108 विशाल नक्काशीदार स्तंभ (Pillars) बनाए गए हैं, जो भगवान शिव के आनंद तांडव नृत्य को दर्शाते हैं।
- शिव पुराण की मूर्तियां: यहाँ शिव-पार्वती विवाह, समुद्र मंथन, त्रिपुरासुर वध जैसी 200 से अधिक विशाल और सजीव मूर्तियां स्थापित हैं। हर मूर्ति के पास एक QR कोड है, जिसे स्कैन करके भक्त उस कथा को सुन सकते हैं।
- रात्रि का नज़ारा: शाम के समय जब महाकाल लोक की लाइट्स जलती हैं, तो यह पूरा क्षेत्र सचमुच स्वर्ग के समान चमक उठता है।
इस महाकाल लोक के बनने के बाद से Ujjain Mahakal आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में रिकॉर्ड तोड़ वृद्धि हुई है, जिससे उज्जैन का पर्यटन वैश्विक स्तर पर पहुँच गया है।

उज्जैन के अन्य प्रमुख रहस्यमयी मंदिर
जब आप Ujjain Mahakal के दर्शन के लिए आते हैं, तो इस पावन नगरी में और भी कई रहस्यमयी और पौराणिक स्थल हैं, जिनके दर्शन के बिना आपकी यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती:
- काल भैरव मंदिर (Kal Bhairav Temple): यह पूरे विश्व का इकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान काल भैरव साक्षात रूप में मदिरा (Liquor) का सेवन करते हैं। भक्त प्रसाद के रूप में मदिरा लाते हैं और पुजारी उसे भैरव बाबा की मूर्ति के मुंह से लगाते हैं, और वह मदिरा चमत्कारी रूप से गायब हो जाती है। विज्ञान भी आज तक इस रहस्य को नहीं सुलझा पाया है।
- हरसिद्धि माता मंदिर (Harsiddhi Temple): यह 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ माता सती की कोहनी गिरी थी। यहाँ प्रांगण में स्थित 1008 दीपकों वाले दो विशाल दीपस्तंभ जब शाम को जलाए जाते हैं, तो वह दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है। राजा विक्रमादित्य इन्हीं माता के परम भक्त थे।
- सांदीपनि आश्रम (Sandipani Ashram): यह वही प्राचीन गुरुकुल है जहाँ द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने गुरु सांदीपनि से 64 दिनों में 64 कलाओं की शिक्षा प्राप्त की थी। यहाँ का ‘गोमती कुंड’ आज भी पवित्रता का प्रतीक है।
- मंगलनाथ मंदिर (Mangalnath Temple): मत्स्य पुराण के अनुसार, मंगल ग्रह (Mars) का जन्म उज्जैन की इसी भूमि पर हुआ था। जिन लोगों की कुंडली में मंगल दोष होता है, वे शांति पूजा के लिए पूरी दुनिया से यहाँ आते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
अंत में, यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि Ujjain Mahakal सिर्फ पत्थरों से बना कोई स्मारक नहीं है; यह एक जीवित और जागृत ऊर्जा का केंद्र है। दूषण राक्षस के वध से लेकर, इल्तुतमिश के क्रूर आक्रमण को झेलने और 500 सालों तक कुएं के अंधेरे में रहने के बावजूद, महाकाल ने अपने भक्तों का साथ कभी नहीं छोड़ा।
आज का Ujjain Mahakal मंदिर और नव-निर्मित महाकाल लोक हमारी सनातन संस्कृति के उसी अजेय साहस, अटूट विश्वास और मृत्यु पर विजय के परिचायक हैं। जीवन में कम से कम एक बार उज्जैन जाकर कालों के काल महाकाल के दर्शन और भस्म आरती का अनुभव जरूर करना चाहिए। यह एक ऐसा आध्यात्मिक अनुभव है, जो आपके मन के सारे भय को समाप्त कर देगा और आपको भीतर तक शिवमय कर देगा।
Frequently Asked Questions (FAQs)
Q1. Ujjain Mahakal की भस्म आरती की बुकिंग कैसे करें?
भस्म आरती की बुकिंग आप श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति की आधिकारिक वेबसाइट (shrimahakaleshwar.com) से ऑनलाइन कर सकते हैं। इसके लिए 15 से 30 दिन पहले बुकिंग करना बेहतर होता है। कुछ कोटा ऑफलाइन भी उपलब्ध होता है जिसके लिए एक दिन पहले कतार में लगना पड़ता है।
Q2. महाकाल मंदिर का ज्योतिर्लिंग दक्षिणमुखी क्यों है?
वास्तु और तंत्र शास्त्र में दक्षिण दिशा को मृत्यु (यम) की दिशा माना जाता है। चूंकि भगवान शिव ‘महाकाल’ हैं जो मृत्यु को भी जीत लेते हैं, इसलिए उनका मुख दक्षिण की ओर है। यह अकाल मृत्यु से बचाता है।
Q3. इल्तुतमिश ने Ujjain Mahakal मंदिर पर कब हमला किया था?
सुल्तान इल्तुतमिश ने वर्ष 1235 ईसवी में उज्जैन पर हमला किया था और मंदिर को बुरी तरह नष्ट कर दिया था। इसके बाद पुजारियों ने ज्योतिर्लिंग को 500 से अधिक वर्षों तक एक कुएं में छिपाकर सुरक्षित रखा था।
Q4. नागचंद्रेश्वर मंदिर कब खुलता है?
Ujjain Mahakal मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर साल में केवल एक दिन ‘नाग पंचमी’ के अवसर पर ही 24 घंटे के लिए दर्शनार्थ खोला जाता है।
Q5. उज्जैन घूमने का सबसे अच्छा समय क्या है?
उज्जैन घूमने के लिए सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच का होता है, जब मौसम सुहावना होता है। इसके अलावा, सावन (जुलाई-अगस्त) और महाशिवरात्रि के समय यहाँ का माहौल अत्यंत दिव्य होता है।













